Wednesday, May 4, 2016

कांशीराम नहीं होते तो आंबेडकर भुला दिए गए होते

कांशीराम के बिना आंबेडकर अधूरा और निष्फल है।
फ़ूले के बिना अम्बेडकर अजन्मा है।
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लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
इन दिनों अम्बेडकरवादियों की बाढ़ आयी हुई है, लेकिन इन अम्बेडकरवादियों में से 99.99 फीसदी संविधान के बारे में कुछ नहीं जानते! ऐसे में मेरा अकसर इनसे सवाल होता है कि आंबेडकरवाद का मतलब क्या है? अधिकतर का जवाब होता है-बाबा साहब की 22 प्रतिज्ञाएँ, जो बुद्ध धर्म ग्रहण करते समय उनके द्वारा घोषित की गयी थी। फिर मेरा प्रतिप्रश्न-यह अम्बेडकरवाद नहीं बुद्ध धर्म का प्रचार है। ऐसे अम्बेडकरवादी कहते हैं कि हमारे लिए यही सब अम्बेडकरवाद है।

मैं ऐसे लोगों से व्यथित हूँ, क्योंकि ऐसे लोग बाबा साहब के विश्वव्यापी व्यक्तित्व को बर्बाद कर रहे हैं। यदि बाबा साहब ने बुद्ध धर्म ग्रहण नहीं किया होता तो क्या हम उनको याद नहीं करते? बिना बुद्ध धर्म बाबा साहब का क्या कोई महत्व नहीं होता? ऐसे सवालों से अम्बेडकरवादी कन्नी काट जाते हैं।

अम्बेडकरवाद की बात करने वालों से मेरा सीधा सवाल है कि आखिर वे चाहते क्या हैं? संविधान का शासन या अम्बेडकरवादियों के छद्म बुद्ध धर्म का प्रचार? इन लोगों को न तो बाबा के योगदान का ज्ञान है और न हीं संविधान की जानकारी। इसके बाद भी ऐसे लोग वंचित समाज का नेतृत्व करने की हिमाकत करते हैं, वह भी केवल बुद्ध धर्म के बाध्यकारी अनुसरण के बल पर और खुद को अम्बेडकरवादी घोषित कर के ही अपने आप को भारत के भाग्यविधाता समझने लगे हैं।

अम्बेडकरवाद की बात करने वालों को शायद ज्ञात ही नहीं है कि 1980 तक आंबेडकर पाठ्यपुस्तकों में एक छोटा का विषय/चैप्टर मात्र रह गए थे। उनका कोई गैर दलित नाम तक नहीं लेता था। कांशीराम जी का उदय नहीं हुआ होता तो न तो आंबेडकर को याद किया जाता और न ही आंबेडकर को भारत रत्न मिलता। इसके बाद भी मुझे याद नहीं कि कांशीराम जी ने खुद को कभी ऐसा ढोंगी अम्बेडकरवादी कहा या प्रचारित किया हो?

कांशीराम जी ने साईकल से मिशन की शुरूआत की तथा अपने जीते जी मिशन को फर्श से अर्श तक पहुंचाया। यदि कांशीराम जी का अन्तिम अंजाम षड्यंत्रपूर्ण नहीं हुआ होता तो वंचित भारत की तस्वीर बदल गयी होती। कांशीराम जी की कालजयी पुस्तक---"चमचा युग"--- आज के अम्बेडकरवादियों के लिए प्रमाणिक पुस्तक है।

इन दिनों अम्बेडकवाद से कहीं अधिक सामाजिक न्याय की विचारधारा को अपनाने की जरूरत है, जो ज्योतिबा फ़ूले से शुरू होकर कांशीराम जी पर रुक गयी है। जिसमें आंबेडकर का बड़ा किरदार है, लेकिन कांशीराम के बिना आंबेडकर अधूरा और निष्फल है। फ़ूले के बिना अम्बेडकर अजन्मा है। ऐसे में अम्बेडकरवाद की बात करने वाले फ़ूले और कांशीराम के साथ धोखा और अन्याय करते हैं। सबसे बड़ा अन्याय बुद्ध के साथ भी करते हैं, क्योंकि बुद्ध संदेह को मान्यता प्रदान करते हैं और सत्य को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं। जबकि अम्बेडकरवादी मनुवादियों की भाँति बाबा के नाम की अंधभक्ति को बढ़ावा देते हैं। बुद्ध और बाबा की मूर्ती पूजा को बढ़ावा दे रहे हैं।

जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी, सब एक समान।।
: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/04-05-2016/04.04 PM
@—लेखक का संक्षिप्त परिचय : मूलवासी-आदिवासी अर्थात रियल ऑनर ऑफ़ इण्डिया। होम्योपैथ चिकित्सक और दाम्पत्य विवाद सलाहकार। राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS), नेशनल चैयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एन्ड रॉयटर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JMWA), पूर्व संपादक-प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक) और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ।

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/ 4 मई, 2016

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